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भीमराव आम्बेडकर

 

बाबा साहेब अंबेडकर का जन्म मध्य प्रदेश के मऊ में 14 अप्रैल 1891 को हुआ था| बाबासाहब आम्बेडकर  भारतीय बहुज्ञ, विधिवेत्ता, अर्थशास्त्री, राजनीतिज्ञ, और समाजसुधारक थे। उन्होंने दलित बौद्ध आन्दोलन को प्रेरित किया और अछूतों (दलितों) से सामाजिक भेदभाव के विरुद्ध अभियान चलाया था। श्रमिकों, किसानों और महिलाओं के अधिकारों का समर्थन भी किया था। वे स्वतंत्र भारत के प्रथम विधि एवं न्याय मन्त्री, भारतीय संविधान के जनक एवं भारत गणराज्य के निर्माताओं में से एक थे।


बाबा साहब का जन्म महार जाति में हुआ था, जिसे उस समय लोग अछूत और निचली जाति मानते थे। अपनी जाति के कारण उन्हें सामाजिक दुराव भी सहन करना पड़ा। प्रतिभाशाली होने के बावजूद स्कूल में उनको छुआ-छूत के कारण अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था। इसे देखते हुए उनके पिता ने स्कूल में उनका उपनामसकपाल की बजायआंबडवेकर लिखवाया। इसके पीछे की वजह यह थी कि वे कोंकण के अंबाडवे गांव के मूल निवासी थे। उस क्षेत्र में उपनाम गांव के नाम पर रखने का प्रचलन था। इस तरह भीमराव सकपाल का नाम आंबडवेकर उपनाम से स्कूल में दर्ज किया गया। इस तरह उनका नाम भीमराव आंबेडकर हो गया, जिसके बाद उन्‍हें अंबेडकर बोला जाना लगा।

आंबेडकर ने सातारा नगर में राजवाड़ा चौक पर स्थित गवर्न्मेण्ट हाईस्कूल (अब प्रतापसिंह हाईस्कूल) में ७ नवंबर १९०० को अंग्रेजी की पहली कक्षा में प्रवेश लिया। इसी दिन से उनके शैक्षिक जीवन का आरम्भ हुआ था, इसलिए ७ नवंबर को महाराष्ट्र में विद्यार्थी दिवस रूप में मनाया जाता हैं।

बाबासाहेब की पहली शादी 1906 में हुई थी. बाबासाहेब तब 15 साल के थे औऱ उनकी पहली शादी रमाबाई से हुई थी. शादी के बाद आंबेडकर की पढ़ाई जारी रही.

1907 में, उन्होंने अपनी मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण की और अगले वर्ष उन्होंने एल्फिंस्टन कॉलेज में प्रवेश किया, जो कि बॉम्बे विश्वविद्यालय से संबद्ध था। इस स्तर पर शिक्षा प्राप्त करने वाले अपने समुदाय से वे पहले व्यक्ति थे।

1913 में एमए करने के लिए वे अमेरिका चले गए. अमेरिका में पढ़ाई करना बड़ौदा के गायकवाड़ शासक सहयाजी राव तृतीय से मासिक वजीफा मिलने के कारण संभव हो सका था.

1921 में लंदन स्कूल ऑफ इकॉनोमिक्स से उन्हें एमए की डिग्री मिली.

लंबी बीमारी के बाद रमाबाई का 1935 में निधन हो गया. अगले 13 सालों तक बाबा साहेब ने विवाह के बारे में सोचा भी नहीं.

1940 के दशक के आखिर में वह जब भारतीय संविधान को बनाने में व्यस्त थे तभी स्वास्थ्य की जटिलताएं उभरनी शुरू हुईं. नींद नहीं आती थी. पैरों में न्यूरोपैथिक दर्द रहने लगा. इंसुलिन और होम्योपैथिक दवाएं किसी हद तक राहत दे पाती थीं. इलाज के लिए वह बंबई गए. डॉक्टरों ने सलाह दी कि उन्हें अब ऐसे साथी की भी जरूरत है, जो न केवल पाक कला में प्रवीण हो बल्कि मेडिकल ज्ञान वाला भी हो, ताकि उनकी केयर कर सके.

चूंकि डॉक्टर सविता बेहद समर्पित तरीके से इलाज कर रही थीं लिहाजा वो उनके करीब भी आ गए थे. नजदीकियां कुछ इस तरह बढ़ीं कि उन्होंने सविता के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा. वो जब मान गईं तो 1948 को दिल्ली स्थित आंबेडकर के आवास पर दोनों की शादी हुई.

डॉ. अम्बेडकर वैश्विक युवाओं के लिये प्रेरणा बन गये क्योंकि उनके नाम के साथ बीए, एमए, एमएससी, पीएचडी, बैरिस्टर, डीएससी, डी.लिट्. आदि कुल 26 उपाधियां जुडी है।

बाबासाहेब को किताबें पढने का बड़ा शौक था. माना जाता है कि उनकी पर्सनल लाइब्रेरी दुनिया की सबसे बड़ी व्यक्तिगत लाइब्रेरी थी, जिसमे 50 हज़ार से अधिक पुस्तकें थीं.

बाबासाहेब भारतीय संविधान की धारा 370, जो जम्मू और कश्मीर को विशेष दर्जा देता है के खिलाफ थे।

बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर को भारत का संविधान निर्माता कहा जाता है.वे संविधान मसौदा समिति के अध्यक्ष थे और उन्हें संविधान का फाइनल ड्राफ्ट तैयार  करने में 2 साल 11 महीने और 17 दिन लगे. पूरे देश में 26 नवंबर को संविधान दिवस के तौर पर मनाया जाता है.

अंबेडकर ने वर्गों के बीच सामाजिक संतुलन बनाने के लिए आरक्षण प्रणाली की शुरुआत की थी. 448 अनुच्छेद, 12 अनुसूची, 5 परिशिष्ट और 98 संसोधनों के साथ यह दुनिया का सबसे बड़ा संविधान है.

बाबा साहब डॉक्टर भीमराव आंबेडकर ने सन 1956 में 14 अक्तूबर को हिंदू धर्म त्याग कर बौद्ध धर्म अपना लिया था. इसकी एक वजह तो यही बताई जाती है कि उन्होंने हिंदू धर्म के वर्णाश्रम धर्म और जाति व्यवस्था के अन्याय और असमानता से तंग आकर बौद्ध धर्म स्वीकार किया था. इससे पहले उन्होंने हिंदू धर्म में सुधार के तमाम प्रयास किए और अंत में उन्हें लगा कि इस धर्म में कोई बुनियादी बदलाव नहीं हो सकता. कम से कम वह काम तो नहीं हो सकता जिसकी कल्पना उन्होंने की थी.

आबेडकर मधुमेह से पीड़ित थे। 6 दिसंबर 1956 को उनकी मृत्यु दिल्ली में नींद के दौरान उनके घर में हो गई। 1990 में उन्हें मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

 

 

 

 

 

चक्रवर्ती राजगोपालाचारी

 

चक्रवर्ती राजगोपालाचारी भारत के वकील, लेखक, राजनीतिज्ञ और दार्शनिक थे। वे राजाजी नाम से भी जाने जाते हैं। वे स्वतन्त्र भारत के द्वितीय गवर्नर जनरल और प्रथम भारतीय गवर्नर जनरल थे। चक्रवर्ती राजगोपालाचारी का जन्म मद्रास प्रेसीडेंसी में थोरापल्ली गाँव के एक समर्पित अयंगर परिवार में, माता-पिता चक्रवर्ती वेंकटार्य अयंगर के घर 10 दिसंबर 1878 को हुआ था। इनके पिता का नाम नलिन चक्रवर्ती था जो कि सेलम के न्यायलय के न्यायाधीश के पद पर कार्यरत थे। इनकी माता का नाम सिंगारम्मा था।

जब चक्रवर्ती राजगोपालाचारी 5 वर्ष के थे, तब उनका परिवार होसुर चला गया इनकी आरंभिक शिक्षा होसूर में प्रारम्भ हुयी। सन् 1891 में इन्होने मेट्रिक्स की परीक्षा पास की। सन् 1894 में सेंट्रल कॉलेज, बैंगलोर (अब बेंगलुरु) से कला में स्नातक की पढ़ाई की।

राजगोपालाचारी ने मद्रास (चेन्नई) के प्रेसीडेंसी कॉलेज में लॉ में अपनी उच्च पढ़ाई जारी रखी। उन्होंने 1897 में अपनी स्नातक की पढ़ाई पूरी की। इनका विवाह सन् 1897  में अलामेलु मंगम्मा से हुआ। इनके तीन पुत्र व 2 पुत्रियां, कुल 5 संताने हुईं। सन् 1916 में इनकी पत्नी की मृत्यु हो गयी। इन्हीं की पुत्री लक्ष्मी का विवाह महात्मा गाँधी के सबसे छोटे पुत्र देवदास से हुआ।

राजगोपालचारी  वाइसराय भवन में रहते हुए भी बहुत ही सादा जीवन बिताते थे और अपने कपड़े खुद धोते और अपने जूतों पर भी खुद पोलिश करते थे | उनकी प्रतिभाओं से प्रभावित होकर माउंटबेटन में राजगोपालचारी को उनके भारत छोडकर जाने के बाद गर्वनर जनरल पद देने का प्रस्ताव रखा | माउंटबेटन की पहली पसंद तो वल्लभभाई पटेल थे और दुसरी पसंद राजगोपालचारी थे | जब नेहरु जी और वल्लभभाई पटेल ने खुद गर्वनर जनरल के पद के लिए मना कर दिया तब राजगोपालचारी गर्वनर जनरल नियुक्त हो गये |

सार्वजनिक जीवन में उन्होंने कई अहम पदों पर कार्य किया | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एक नेता होने के अलावा वह मद्रास प्रेसीडेंसी के प्रमुख ,पश्चिम बंगाल के राज्यपाल , भारत के गृह मंत्री और मद्रास के मुख्यमंत्री भी रहे |

सन् 1900 में उन्होंने सलेम कोर्ट में कानूनी प्रैक्टिस शुरू की। राजनीति में प्रवेश करने पर, वह सलेम नगरपालिका के सदस्य और बाद में राष्ट्रपति बने। सन् 1904 में देशसेवा की भावना से वे कांग्रेस में सम्मिलित हुए।

सन् 1921 में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के महासचिव बने। उस समय चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने जवाहरलाल नेहरू, वल्लभभाई पटेल, मौलाना आज़ाद, अनुग्रह नारायण सिन्हा, राजेंद्र प्रसाद के साथ अंतरंग संबंध स्थापित किया। कुछ ही समय में वह पार्टी के शीर्ष नेताओं में से एक बन गए।

सन् 1930 में जब गांधी जी ने दांडी मार्च किया तो इन्होंने भी नमक कानून तोड़ा था. राजनीति के साथ-साथ ही राजगोपालचारी ने भारतीय जात-पात के आडंबर पर भी गहरा चोट किया. कई मंदिरों में जहां दलित समुदाय का मंदिर में जाना वर्जित था,

सन् 1937 में काउंसिल  के चुनावों में मद्रास प्रांत में कांग्रेस की जीत हुई. इसके अगुआ राजाजी रहे. उन्हें मद्रास का मुख्यमंत्री बनाया गया. सन् 1939 में उन्होंने पद से इस्तीफा दे दिया.

सन् 1942  के कांग्रेस के इलाहबाद अधिवेशन में इन्होंने भारत के विभाजन को स्पष्ट सहमति दी। अपने इस मत के लिए इन्हे कांग्रेसी नेताओं और जनता का बहुत विरोध सहना पड़ा हालाँकि इन्होंने इसकी जरा भी परवाह नहीं की।

सन् 1946 में चक्रवर्ती राजगोपालाचारी को राज्यपाल के सदस्य के रूप में चुना गया था। अंतरिम सरकार में उन्होंने शिक्षा और कला मंत्री के रूप में कार्य किया। उन्होंने उद्योग और आपूर्ति मंत्री और वित्त मंत्री का पद भी संभाला।

सन 1951 में राजगोपालाचारी जी ने अंग्रेजी भाषा में महाभारत की एक संक्षिप्त रीलिंग लिखी. इसके साथ ही साथ राजगोपालाचारी जी ने अंग्रेजी में रामायण और भगवत गीता भी लिखी. इसके अलावा राजनीति से बाहर आने के बाद राजगोपालाचारी जी ने अपने साहित्यिक कार्यों में अपना पूरा समय समर्पित किया.

भारतीय राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले राजा जी को 1954 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया। भारत रत्न पाने वाले वे पहले व्यक्ति थे। साहित्य अकादमी द्वारा उन्हें पुस्तक ‘चक्रवर्ती थिरुमगम्" पर सम्मान भी मिला।

1972 में राजगोपालाचारी जी का स्वास्थ्य ख़राब होना शुरू हो गया था. 10 दिसंबर को राजगोपालाचारी जी का 94 वां जन्मदिन मनाने के ठीक 1 सप्ताह बाद यानि 17 दिसंबर को उन्हें सरकारी अस्पताल में भर्ती किया गया. वे यूरिया, डीहाइड्रेशन, और यूरिनरी इन्फेक्शन से पीढित थे. धीरे – धीरे उनका स्वास्थ्य और ख़राब होता चला गया, और 25 दिसंबर 1972 को क्रिसमस डे के दिन राजगोपालाचारी जी का देहांत हो गया

 

 

डॉ राजेन्द्र प्रसाद

 

डॉ. राजेंद्र प्रसाद का जन्म 3 दिसंबर 1884 को जीरादेई (बिहार) में हुआ था। डॉ राजेन्द्र प्रसाद भारत के प्रथम राष्ट्रपति एवं महान भारतीय स्वतंत्रता सेनानी थे। भारतीय संविधान के निर्माण में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया था। उनके पिता का नाम महादेव सहाय एवं माता का नाम कमलेश्वरी देवी था। पिता फारसी और संस्कृत भाषाओं के विद्वान तो माता धार्मिक महिला थीं। राजेन्द्र प्रसाद को रामायण की कहानियां भी सुनाया करती थी.

स्कूल के दिनों में डॉ राजेंद्र प्रसाद एक बुद्धिमान छात्र थे। उन्हें हर महीना 30 रूपये की स्कॉलरशिप मिलती थी। उनकी एग्जाम शीट को देखकर एक परीक्षक ने कहा था एग्जामिनी इस बेटर दैन एग्जामिनर

डॉ. प्रसाद का बाल विवाह 12 साल की उम्र में हो गया था. उनकी पत्नी का नाम राजवंशी देवी था.

1902 में प्रसाद जी ने प्रेसीडेंसी कॉलेज में दाखिला लिया, जहाँ से इन्होंने स्नातक किया. 1907 में यूनिवर्सिटी ऑफ़ कलकत्ता से इकोनॉमिक्स में एम् किया. सन 1915 में कानून में मास्टर की डिग्री पूरी की जिसके लिए उन्हें गोल्ड मेंडल से सम्मानित किया गया. इसके बाद उन्होंने कानून में डॉक्टरेट की उपाधि भी प्राप्त की. इसके बाद पटना आकर वकालत करने लगे जिससे इन्हें बहुत धन ओर नाम मिला.

चंपारण आंदोलन के दौरान डॉ राजेंद्र प्रसाद ने देखा कि महात्मा गांधी तन मन धन से लोगों की सेवा करते हैं। इससे प्रभावित होकर वह भी चंपारण आंदोलन में शामिल हो गए। जब महात्मा गांधी को ठहरने के लिए कहीं जगह नहीं मिली तो वे डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद के घर पर ठहरे थे।  

राजेंद्र प्रसाद 1911 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हुए। वे बिहार और ओडिशा क्षेत्र के नेता बन गए और महात्मा गांधी का समर्थन किया। 1931 के नमक सत्याग्रह आंदोलन और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उनकी गिरफ्तारी सहित उन्हें कई बार जेल भी जाना पड़ा।

1934 में बिहार में भूकंप और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा आई थी। वहां पर रिलीफ फंड जमा करने के लिए राजेंद्र प्रसाद ने बहुत मेहनत की। उन्होंने कुल 38 लाख रूपये जुटाए थे जो वायसराय के फंड से 3 गुना अधिक था। उन्होंने खुद पीढ़ित लोगो को दवाइयाँ और कपड़े बांटे थे।

आजादी के बाद 26 जनवरी 1950 को भारत को गणतंत्र राष्ट्र का दर्जा मिलने के साथ ही राजेंद्र प्रसाद देश के प्रथम राष्ट्रपति बने। वर्ष 1957 में वे दोबारा राष्ट्रपति चुने गए। इस तरह वे भारत के एकमात्र राष्ट्रपति थे, जिन्होंने लगातार दो बार राष्ट्रपति पद प्राप्त किया था। उन्हें सन् 1962 में अपने राजनैतिक और सामाजिक योगदान के लिए भारत के सर्वश्रेष्ठ नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' से भी नवाजा गया।

राजेन्द्र बाबू ने अपनी आत्मकथा  के अतिरिक्त कई पुस्तकें भी लिखी जिनमें बापू के कदमों में बाबू , इण्डिया डिवाइडेड, सत्याग्रह ऐट चम्पारण, गान्धीजी की देन, भारतीय संस्कृति व खादी का अर्थशास्त्र इत्यादि उल्लेखनीय हैं।

सन 1962 में अवकाश प्राप्त करने पर राष्ट्र ने उन्हें भारत रत्‍न की सर्वश्रेष्ठ उपाधि से सम्मानित किया। यह उस भूमिपुत्र के लिये कृतज्ञता का प्रतीक था जिसने अपनी आत्मा की आवाज़ सुनकर आधी शताब्दी तक अपनी मातृभूमि की सेवा की थी।


जीवन के आख़िरी महीने बिताने के लिये उन्होंने पटना के निकट सदाकत आश्रम चुना। यहाँ पर 28 फ़रवरी 1963 में उनके जीवन की कहानी समाप्त हुई।

डॉ राजेंद्र प्रसाद की मृत्यु के बाद भी उनके सम्मान में उनका पटना में “पंजाब नेशनल बैंक” में खोला गया अकाउंट आज भी चालू है। वह बैंक अकाउंट 24 अक्टूबर 1962 को खोला गया था। इस समय उनके खाते में सिर्फ 1213 रुपए हैं। 

 

 

 

 


लालबहादुर शास्त्री

 

लाल बहादुर शास्त्री का जन्म 2 अक्टूबर, 1904 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी से सात मील दूर एक छोटे से रेलवे शहर मुगलसराय में हुआ था। उनके पिता एक स्कूल शिक्षक थे। जब लाल बहादुर शास्त्री केवल डेढ़ वर्ष के थे तभी उनके पिता का देहांत हो गया था। उनकी माँ अपने तीनों बच्चों के साथ अपने पिता के घर जाकर बस गईं।

शास्त्री जी को वाराणसी में उनके चाचा के साथ रहने के लिए भेजा गया था ताकि वह हाई स्कूल में जा सके। उनके चाचा उन्हें नन्हे कहकर बुलाया करते थे। वह भरी गर्मी में भी बिना जूते के कई मील पैदल चलकर स्कूल जाते थे।

काशी विद्या पीठ ने लाल बहादुर शास्त्री को 1926 में 'शास्त्री' की उपाधि दी। काशी विद्या पीठ से उन्होंने स्नातक की पढ़ाई की थी। 1927 में उनकी शादी हो गई। उनकी पत्नी ललिता देवी मिर्जापुर से थीं जो उनके अपने शहर के पास ही था। उनकी शादी सभी तरह से पारंपरिक थी। दहेज के नाम पर एक चरखा एवं हाथ से बुने हुए कुछ मीटर कपड़े थे। वे दहेज के रूप में इससे ज्यादा कुछ और नहीं चाहते थे।

1930 में महात्मा गांधी ने नमक कानून को तोड़ते हुए दांडी यात्रा की। इस प्रतीकात्मक सन्देश ने पूरे देश में एक तरह की क्रांति ला दी। लाल बहादुर शास्त्री विह्वल ऊर्जा के साथ स्वतंत्रता के इस संघर्ष में शामिल हो गए। उन्होंने कई विद्रोही अभियानों का नेतृत्व किया एवं कुल सात वर्षों तक ब्रिटिश जेलों में रहे। आजादी के इस संघर्ष ने उन्हें पूर्णतः परिपक्व बना दिया।

1946 में जब कांग्रेस सरकार का गठन हुआ तो इस ‘छोटे से डायनमो को देश के शासन में रचनात्मक भूमिका निभाने के लिए कहा गया। उन्हें अपने गृह राज्य उत्तर प्रदेश का संसदीय सचिव नियुक्त किया गया और जल्द ही वे गृह मंत्री के पद पर भी आसीन हुए।

लाल बहादुर शास्त्री सादा जीवन और उच्च विचार रखने वाले व्यक्तित्व थे. उनका पूरा जीवन हर व्यक्ति के लिए अनुकरणीय है. जय जवान-जय किसान का नारा देकर उन्होंने न सिर्फ देश की रक्षा के लिए सीमा पर तैनात जवानों का मनोबल बढ़ाया बल्कि खेतों में अनाज पैदा कर देशवासियों का पेट भरने वाले किसानों का आत्मबल भी बढ़ाया

लाल बहादुर शास्त्री के बारे में कुछ रोचक तथ्य

1. जब इंदिरा गाँधी शास्त्री जी के घर (प्रधान मंत्री आवास) पर पहुची तो कहा कि यह तो चपरासी का घर लग रहा है, इतनी सादगी थी हमारे शास्त्रीजी में…

 

2. शास्त्री जी अभी तक के एक मात्र ऐसे प्रधान मंत्री रहे हैं जिनहोने देश के बजट मे से 25 प्रतिशत सेना के ऊपर खर्च करनेका फैसला लिया था।शास्त्री ने जय जवान जय किसान" का नारा दिया और भारत के भविष्य को बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

 

 

3. जब भारत पाकिस्तान का युद्ध चल रहा तो अमेरिका ने भारत पर दबाव बनाने के लिए कहा था की भारत युद्ध खत्म कर दे नहीं तो अमेरिका भारत को खाने के लिए गेहू देना बंद कर देगा तो इसके जवाब मे शास्त्री जी ने कहा की हम स्वाभिमान से भूखे रहना पसंद करेंगे किसी के सामने भीख मांगने की जगह |

 

4. लाल बहादुर शास्त्री जी ने अपने विवाह के समय दहेज प्रथा के विरुद्ध जाकर मात्र खादी का कपड़ा और चरखा ही स्वीकार किया |

 

5. लाल बहादुर शास्त्री जी ने अपने प्रधानमन्त्री कार्यकाल के दौरान उन्होंने हरित और श्वेत क्रांति को प्रोत्साहित और बढ़ावा देने का कार्य किया और गुजरात के आनंद में स्थित अमूल दूध सहकारी के साथ मिलकर राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड की स्थापना की |

 

6. लाल बहादुर शास्त्री जी की सूझबूझ से ही पाकिस्तान भारत से वर्ष 1965 में युद्ध हार गया था जो कि सोचता था कि वर्ष 1962 में मिली चीन की हार से भारत कमजोर हो गया होगा |

 

7.   लाल बहादुर शास्त्री जी अपने जीवन में बहुत सरल, ईमानदार और साधारण व्यक्तित्व के व्यक्ति   थे| वे फटे कपड़ों से बाद में रूमाल बनवाते थे औऱ फटे कुर्तों को कोट के नीचे पहनते थे।

 

8. लाल बहादुर शास्त्री जी का असली नाम लाल बहादुर श्रीवास्तव था | शास्त्री की उपाधि उन्हें काशी विद्यापीठ से स्नातक की शिक्षा पूर्ण करने के बाद मिली जिसके बाद वह अपने नाम के आगे शास्त्री लगाने लगे |

 

9. भारत के खाद्य उत्पादन की मांग को बढ़ावा देने के लिए हरित क्रांति के विचार को भी एकीकृत किया था।

 

10.   दहेज प्रथा और जाति प्रथा के खिलाफ आवाज उठाई।

 

शास्त्री का प्रधानमंत्री बनना संयोग भले ही नहीं कहा जाए. लेकिन उनका नेहरू का उत्तराधिकारी बनना स्वाभाविक भी नहीं था. वे एक गांधीवादी नेता थे. लेकिन उनका पार्टी में शीर्ष नेताओं के बीच प्रमुखता से छा जाना अचानक नहीं हुआ. कहा जाता है कि नेहरू ने अपने अंतिम दिनों में प्रधानमंत्री रहते हुए शास्त्री को काफी जिम्मेदारियां सौंपनी शुरू कर दीं थीं, जिससे पार्टी में ये संदेश गया कि वो उन्हें अगले प्रधानमंत्री के रूप में तैयार कर रहे हैं.

उस समय प्रधानमंत्री पद की दौड़ में  गुलजारी लाल नंदा, जय प्रकाश नारायाण और मोरारजी देसाई शामिल थे जो शास्त्री की दावेदारी को कड़ी टक्कर दे रहे थे. गुलजारी लाल नंदा थे तब गृह मंत्री थे और इस लिहाज से मंत्रिमंडल में दूसरे स्थान पर थे. मोरारजी देसाई भी थे जिनका मंत्रिमंडल के बाहर बहुत गहरा प्रभाव था. जय प्रकाश नारायण का भी अपना करिश्माई व्यक्तित्व था.

शास्त्री जी ने 11 जनवरी, 1966 को ताशकंद में अंतिम सांस ली थी. 10 जनवरी 1966 को ताशकंद में पाकिस्तान के साथ शांति समझौते पर करार के महज 12 घंटे बाद (11 जनवरी) लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु हो गई थी.

सरदार वल्लभ भाई पटेल

 

वल्लभ भाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर, 1875 को गुजरात के नाडियाड में उनके ननिहाल में हुआ। भारत के प्रथम गृह मंत्री और प्रथम उप प्रधानमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल को हम लौह पुरुष के नाम से भी जानते हैं।पिता का नाम झावेर भाई और माता का नाम लाडबा पटेल था।

 माता-पिता की चौथी संतान वल्लभ भाई कुशाग्र बुद्धि के थे। उनकी रुचि भी पढ़ाई में ही ज्यादा रही। लॉ डिग्री हासिल करने के बाद वो वकालात करने लगे। 16 साल की उम्र में ही उनका विवाह कर दिया गया था | पत्नी का नाम झावेरबा था। दो बच्चे हुए। बेटी का नाम मणिबेन और बेटे का दाहया भाई पटेल था। पर उन्होंने अपने विवाह को अपनी पढ़ाई के रास्ते में नहीं आने दिया और 22 साल की उम्र में उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा पास की और ज़िला अधिवक्ता की परीक्षा में भी उत्तीर्ण हुए, जिससे उन्हें वकालत करने की अनुमति मिली। कितने मेधावी थे इसका अनुमान इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि 1910 में वो पढ़ाई के लिए इंग्लैंड गए और लॉ का कोर्स उन्होंने आधे वक्त में ही पूरा कर लिया।



1917 में मोहनदास करमचन्द गांधी के संपर्क में आने के बाद उन्होंने ब्रिटिश राज की नीतियों के विरोध में अहिंसक और नागरिक अवज्ञा आंदोलन के जरिए खेड़ा, बरसाड़ और बारदोली के किसानों को एकत्र किया. अपने इस काम की वजह से देखते ही देखते वह गुजरात के प्रभावशाली नेताओं की श्रेणी में शामिल हो गए

बात 1909 की है। पटेल की पत्नी गंभीर तौर पर बीमार थीं। 11 जनवरी 1909 की बात है। पटेल को एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के केस की सुनवाई के लिए कोर्ट जाना था। वो पहुंचे। जिरह करने लगे। इसी दौरान अदालत का एक कर्मचारी आया। उसने एक टेलिग्राम पटेल के हाथ में रख दिया। इस पर लिखा था कि उनकी पत्नी का निधन हो गया है। पटेल ने उसे पढ़ा। फिर संभालकर जेब में रख लिया और जिरह पूरी की। यह स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बरी हुआ। बाद में जज को ये घटना पता लगी। उसने सरदार से पूछा, आपने ऐसा क्यों किया? पटेल साहब ने जवाब दिया- ये तो मेरा फर्ज था। मेरे मुवक्किल को झूठे मामले में फंसाया गया है। मैं अन्याय के पक्ष में कैसे जा सकता हूं।

सन 1947 में भारत को आजादी तो मिल गयी थी लेकिन इसके बावजूद देश के सामने चुनौती थी अपनी छोटी-छोटी रियासतों को एक करने की जिससे एक अखंड व् विशाल भारतवर्ष का सपना साकार हो पाता। देश में कुल 562 रियासतें थीं। ज्यादातर राजा भारत में विलय के लिए तैयार थे। लेकिन, कुछ ऐसे भी थे जो स्वतंत्र रहना चाहते थे। 15 अगस्त, 1947 तक हैदराबाद, कश्मीर और जूनागढ़ को छोड़कर शेष भारतीय रियासतें ‘भारत संघ में सम्मिलित हो गईं.

 

जूनागढ सौराष्ट्र के पास एक छोटी रियासत थी और चारों ओर से भारतीय भूमि से घिरी थी। वह पाकिस्तान के समीप नहीं थी। वहाँ के नवाब ने 15 अगस्त 1947 को पाकिस्तान में विलय की घोषणा कर दी। राज्य की सर्वाधिक जनता हिंदू थी और भारत विलय चाहती थी। नवाब के विरुद्ध बहुत विरोध हुआ तो भारतीय सेना जूनागढ़ में प्रवेश कर गयी। नवाब भागकर पाकिस्तान चला गया और 9 नवम्बर 1947 को जूनागढ भी भारत में मिल गया। फरवरी 1948 में वहाँ जनमत संग्रह कराया गया, जो भारत में विलय के पक्ष में रहा।

हैदराबाद भारत की सबसे बड़ी रियासत थी, जो चारों ओर से भारतीय भूमि से घिरी थी। जब हैदराबाद के निजाम ने भारत में विलय का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया तो सरदार पटेल ने वहां सेना भेजकर निजाम का आत्मसमर्पण करा लिया।

सरदार पटेल जी ने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने के लिए भारत के लोगों को एकजुट करने के लिए कड़ी मेहनत की। वे लोगों को एक साथ लाने और उन्हें एक लक्ष्य की ओर ले जाने के लिए जाने जाते थे। उनके नेतृत्व के गुणों की सराहना सभी ने की थी। 31 अक्टूबर उनके जन्मदिन के अवसर पर इस दिशा में उनके प्रयास को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में घोषणा करके सम्मानित किया गया था।

कहा जाता हैं अगर पटेल प्रधानमंत्री होते, तो आज पाकिस्तान, चीन जैसी समस्या इतना बड़ा रूप नहीं लेती. पटेल की सोच इतनी परिपक्व थी कि वे पत्र की भाषा पढ़कर ही सामने वाले के मन के भाव समझ जाते थे. उन्होंने कई बार नेहरु जी को चीन के लिए सतर्क किया, लेकिन नेहरु ने इनकी कभी ना सुनी और इसका परिणाम भारत और चीन का युद्ध हुआ था.

पटेल एवं नेहरु दोनों गाँधी विचार धारा से प्रेरित थे, इसलिए ही शायद एक कमान में थे. वरना तो इन दोनों की सोच में जमीन आसमान का अंतर था. जहाँ पटेल भूमि पर थे, मिट्टी में रचे बसे साधारण व्यक्तित्व के तेजस्वी व्यक्ति थे. वही नेहरु जी अमीर घरानों के नवाब थे, जमीनी हकीकत से दूर, एक ऐसे व्यक्ति जो बस सोचते थे और वही कार्य पटेल करके दिखा देते थे. शैक्षणिक योग्यता हो या व्यवहारिक सोच हो इन सभी में पटेल नेहरु जी से काफी आगे थे. कांग्रेस में नेहरु जी के लिए पटेल एक बहुत बड़ा रोड़ा थे.



सरदार वल्लभ भाई पटेल जी की याद में पीएम मोदी जी ने गुजरात में सबसे ऊँची मूर्ती स्टैच्यू ऑफ यूनिटी का निर्माण करवाया |इसकी ऊँचाई 240 मीटर है, जिसमें 58 मीटर का आधार है। मूर्ति की ऊँचाई 182 मीटर है, जो स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी से लगभग दोगुनी ऊँची है।

15 दिसंबर, 1950 को सरदार पटेल इस दुनिया को अलविदा कह गए . भारत देश को आज ऐसे ही लौह पुरुष की तलाश है जो देश में एकता और अखंडता लाने में फिर से सफल हो सके.

 





 

स्वामी विवेकानंद

 

स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 को कोलकाता में हुआ था | उनका घर का नाम नरेंद्र दत्त था। उनके पिता व‍िश्‍वनाथ दत्त कलकत्ता हाईकोर्ट के वकील थे, जबकि मां भुवनेश्वरी देवी धार्मिक विचारों वाली महिला थीं उनके पिता विश्वनाथ दत्त पाश्चात्य सभ्यता में विश्वास रखते थे। वे अपने पुत्र नरेंद्र को भी अंगरेजी पढ़ाकर पाश्चात्य सभ्यता के ढंग पर ही चलाना चाहते थे। नरेंद्र की बुद्धि बचपन से बड़ी तीव्र थी और परमात्मा को पाने की लालसा भी प्रबल थी। इस हेतु वे पहले ब्रह्म समाज में गए किंतु वहां उनके चित्त को संतोष नहीं हुआ। कुछ समय बाद रामकृष्ण परमहंस की प्रशंसा सुनकर नरेंद्र तर्क करने के विचार से उनके पास गए लेकिन उनके विचारों और सिद्धांतों से प्रभावित हो उन्हें अपना गुरू मान लिया.


स्वामी विवेकानंद जी ने सन् 1871 में आठ साल की उम्र में ईश्वर चंद विद्यासागर के मेट्रोपोलिटन संस्थान में दाखिला लिया जहाँ उन्होंने स्कूल जाना प्रारम्भ किया। सन् 1877 में उनका परिवार रायपुर चला गया। सन् 1879 में उनका परिवार वापस कलकत्ता आ गया। वह प्रेसीडेंसी कॉलेज प्रवेश परीक्षा में प्रथम डिवीज़न से अंक प्राप्त करने वाले वे एकमात्र छात्र थे।

25 वर्ष की अवस्था में नरेंद्र दत्त ने गेरुआ वस्त्र पहन लिए। तत्पश्चात उन्होंने पैदल ही पूरे भारतवर्ष की यात्रा की। 1893 में शिकागो (अमेरिका) में विश्व धर्म परिषद् हो रही थी। स्वामी विवेकानंदजी उसमें भारत के प्रतिनिधि के रूप से पहुंचे। योरप-अमेरिका के लोग उस समय पराधीन भारतवासियों को बहुत हीन दृष्टि से देखते थे। वहां लोगों ने बहुत प्रयत्न किया कि स्वामी विवेकानंद को सर्वधर्म परिषद् में बोलने का समय ही न मिले। एक अमेरिकन प्रोफेसर के प्रयास से उन्हें थोड़ा समय मिला किंतु उनके विचार सुनकर सभी विद्वान चकित हो गए।

अमेरिका में जब स्‍वामी विवेकानंद ने 'अमेरिका के भाइयों और बहनों' के संबोधन से भाषण शुरू किया तो पूरे दो मिनट तक आर्ट इंस्टीट्यूट ऑफ शिकागो में तालियां बजती रहीं. 11 सितंबर 1893 का वो द‍िन हमेशा-हमेशा के ल‍िए इतिहास में दर्ज हो गया.

एक बार की बात है एक विदेशी महिला स्वामी विवेकानंद के करीब आकर बोली कि वो उनसे शादी करना चाहती है। इस तरह के आग्रह पर विवेकानंद बोले कि आखिर मुझसे ही क्यों। आप जानती नहीं की मैं एक सन्यासी हूं? औरत बोली कि मैं आपके जैसा ही गौरवशाली, सुशील और तेजोमयी पुत्र चाहती हूं और इसकी संभावना तभी है जब आप मुझसे विवाह करें।विवेकानंद बोले कि हमारी शादी तो संभव नहीं है। लेकिन एक उपाय है आज से मैं ही आपका पुत्र बन जाता हूं, आप मेरी मां बन जाओ आपको मेरे रूप में मेरे जैसा बेटा मिल जायेगा.औरत विवेकानंद के चरणों में गिर गयी और बोली की आप साक्षात् ईश्वर के रूप है।

स्वामी विवेकानंद कृतियाँ

संगीत कल्पतरु

कर्म योग

राज योग

वर्तमान भारत (बांग्ला में ; मार्च 1899), उद्बोधन

ज्ञान योग

भक्ति योग

स्वामी विवेकानंद के अनमोल वचन

1.उठो और जागो और तब तक रुको नहीं जब तक कि तमु अपना लक्ष्य प्राप्त नहीं कर लेते |

 

2.जब तक आप खुद पे विश्वास नहीं करते तब तक आप भागवान पर विश्वास नहीं कर सकते |

 

3.खुद को कमजोर समझना सबसे बड़ा पाप है।

 

4.जितना बड़ा संघर्ष होगा जीत उतनी ही शानदार होगी |

 

5.मनुष्य की सेवा ही भगवान् की सेवा है |

 

6.एक समय में एक  ही काम करो, और इसे करते हुए अपना सबकुछ इसमें झोक दो 

 

7.हम जो बोते हैं वो काटते हैं। हम स्वयं अपने भाग्य के निर्माता हैं।

 

8.जो तुम सोचते हो वो हो जाओगे. यदि तुम खुद को कमजोर सोचते हो, तुम कमजोर हो जाओगे, अगर खुद को ताकतवर सोचते हो, तुम ताकतवर हो जाओगे |

 

9.शक्ति जीवन है, निर्बलता मृत्यु है, विस्तार जीवन है, संकुचन मृत्यु है, प्रेम जीवन है, द्वेष मृत्यु है |

 

10.स्वतंत्र होने का साहस करो. जहाँ तक तुम्हारे विचार जाते हैं वहां तक जाने का साहस करो, और उन्हें अपने जीवन में उतारने का साहस करो |

 


स्वामी जी की मृत्यु 4 जुलाई, 1902 को हुई। इस तरह स्वामी विवेकानंद महज महज 39 साल की आयु इस नश्वर जगत को छोड़कर चले गए। मृत्यु के पहले शाम के समय बेलूर मठ में उन्होंने 3 घंटे तक योग किया। शाम के 7 बजे अपने कक्ष में जाते हुए उन्होंने किसी से भी उन्हें व्यवधान ना पहुंचाने की बात कही और रात के 9 बजकर 10 मिनट पर उनकी मृत्यु की खबर मठ में फैल गई।

महात्मा गांधी

प्रारंभिक जीवन

महात्मा गांधी का जन्म गुजरात के पोरबंदर में 2 अक्टूबर 1869 को हुआ था | असली नाम मोहनदास करमचंद गांधी था और यह अपने तीन भाइयों में सबसे छोटे थे। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के एक प्रमुख राजनैतिक नेता थे। सत्याग्रह और अहिंसा के सिद्धान्तो पर चलकर उन्होंने भारत को आजादी दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। महात्मा गांधी जी को भारत का राष्ट्रपिता भी कहा जाता है। उनके पिता करमचन्द गान्धी ब्रिटिश राज के समय काठियावाड़ की एक छोटी सी रियासत (पोरबंदर) के दीवान थे। मोहनदास की माता पुतलीबाई परनामी वैश्य समुदाय से ताल्लुक रखती थीं और अत्यधिक धार्मिक प्रवित्ति की थीं

सन 1883 में 13 साल की उम्र में ही उनका विवाह 14 साल की कस्तूरबा से करा दिया गया। जब मोहनदास 15 वर्ष के थे तब इनकी पहली सन्तान ने जन्म लिया लेकिन वह केवल कुछ दिन ही जीवित रही। बाद में मोहनदास और कस्तूरबा के चार सन्तान हुईं– मणिलाल गान्धी रामदास गान्धी हरीलाल गान्धी और देवदास गांधी।

उनकी मिडिल स्कूल की शिक्षा पोरबंदर में और हाई स्कूल की शिक्षा राजकोट में हुई। गांधी जी की मातृ-भाषा गुजराती थी। उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा अहमदाबाद से उत्तीर्ण की। इसके बाद मोहनदास ने भावनगर के शामलदास कॉलेज में दाखिला लिया पर ख़राब स्वास्थ्य और गृह वियोग के कारण वह अप्रसन्न ही रहे और कॉलेज छोड़कर पोरबंदर वापस चले गए।



“विदेश में शिक्षा और वकालत”

मोहनदास अपने परिवार में सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे थे इसलिए उनके परिवार वाले ऐसा मानते थे कि वह अपने पिता और चाचा का उत्तराधिकारी (दीवान) बन सकते थे। उनके एक परिवारक मित्र मावजी दवे ने ऐसी सलाह दी कि एक बार मोहनदास लन्दन से बैरिस्टर बन जाएँ तो उनको आसानी से दीवान की पदवी मिल सकती थी। उनकी माता पुतलीबाई और परिवार के अन्य सदस्यों ने उनके विदेश जाने के विचार का विरोध किया पर मोहनदास के आस्वासन पर राज़ी हो गए। वर्ष 1888 में मोहनदास यूनिवर्सिटी कॉलेज लन्दन में कानून की पढाई करने और बैरिस्टर बनने के लिये इंग्लैंड चले गये। जून 1891 में गाँधी भारत लौट गए और वहां जाकर उन्हें अपनी मां के मौत के बारे में पता चला। उन्होंने बॉम्बे में वकालत की शुरुआत की पर उन्हें कोई खास सफलता नहीं मिली। इसके बाद वो राजकोट चले गए जहाँ उन्होंने जरूरतमन्दों के लिये मुकदमे की अर्जियाँ लिखने का कार्य शुरू कर दिया परन्तु कुछ समय बाद उन्हें यह काम भी छोड़ना पड़ा।

“गाँधी जी दक्षिण अफ्रीका में”

गाँधी 24 साल की उम्र में दक्षिण अफ्रीका पहुंचे। वह प्रिटोरिया स्थित कुछ भारतीय व्यापारियों के न्यायिक सलाहकार के तौर पर वहां गए थे। उन्होंने अपने जीवन के 20-21 साल दक्षिण अफ्रीका में बिताये जहाँ उनके राजनैतिक विचार और नेतृत्व कौशल का विकास हुआ। दक्षिण अफ्रीका में उनको गंभीर नस्ली भेदभाव का सामना करना पड़ा। एक बार ट्रेन में प्रथम श्रेणी कोच की वैध टिकट होने के बाद तीसरी श्रेणी के डिब्बे में जाने से इन्कार करने के कारण उन्हें ट्रेन से बाहर फेंक दिया गया। ये सारी घटनाएँ उनके के जीवन में महत्वपूर्ण मोड़ बन गईं और मौजूदा सामाजिक और राजनैतिक अन्याय के प्रति जागरुकता का कारण बनीं।

“स्वतंत्रता संग्राम का संघर्ष”

वर्ष 1914 में गांधी दक्षिण अफ्रीका से भारत वापस लौट आये। इस समय तक गांधी एक राष्ट्रवादी नेता और संयोजक के रूप में प्रतिष्ठित हो चुके थे। वह उदारवादी कांग्रेस नेता गोपाल कृष्ण गोखले के कहने पर भारत आये थे और शुरूआती दौर में गाँधी के विचार बहुत हद तक गोखले के विचारों से प्रभावित थे। प्रारंभ में गाँधी ने देश के विभिन्न भागों का दौरा किया और राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक मुद्दों को समझने की कोशिश की।

“चम्पारण और खेड़ा सत्याग्रह”

बिहार के चम्पारण और गुजरात के खेड़ा में हुए आंदोलनों ने गाँधी को भारत में पहली राजनैतिक सफलता दिलाई। चंपारण में ब्रिटिश ज़मींदार किसानों को खाद्य फसलों की बजाए नील की खेती करने के लिए मजबूर करते थे और सस्ते मूल्य पर फसल खरीदते थे जिससे किसानों की स्थिति बदतर होती जा रही थी।  इस कारण वे अत्यधिक गरीबी से घिर गए। एक विनाशकारी अकाल के बाद अंग्रेजी सरकार ने दमनकारी कर लगा दिए जिनका बोझ दिन प्रतिदिन बढता ही गया। कुल मिलाकर  स्थिति बहुत निराशाजनक थी। गांधीजी ने गांधी जी ने जमींदारों के खिलाफ़ विरोध प्रदर्शन और हड़तालों का नेतृत्व किया जिसके बाद गरीब और किसानों की मांगों को माना गया।

 


“खिलाफत आन्दोलन”

कांग्रेस के अन्दर और मुस्लिमों के बीच अपनी लोकप्रियता बढ़ाने का मौका गाँधी जी को खिलाफत आन्दोलन के जरिये मिला। खिलाफत एक विश्वव्यापी आन्दोलन था जिसके द्वारा खलीफा के गिरते प्रभुत्व का विरोध सारी दुनिया के मुसलमानों द्वारा किया जा रहा था। भारत में खिलाफत का नेतृत्व ‘आल इंडिया मुस्लिम कांफ्रेंस’ द्वारा किया जा रहा था। धीरे-धीरे गाँधी इसके मुख्य प्रवक्ता बन गए। भारतीय मुसलमानों के साथ एकजुटता व्यक्त करने के लिए उन्होंने अंग्रेजों द्वारा दिए सम्मान और मैडल वापस कर दिया। इसके बाद गाँधी न सिर्फ कांग्रेस बल्कि देश के एकमात्र ऐसे नेता बन गए जिसका प्रभाव विभिन्न समुदायों के लोगों पर था।

“असहयोग आन्दोलन”

गाँधी जी का मानना था की भारत में अंग्रेजी हुकुमत भारतियों के सहयोग से ही संभव हो पाई थी और अगर हम सब मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ हर बात पर असहयोग करें तो आजादी संभव है। गाँधी जी की बढती लोकप्रियता ने उन्हें कांग्रेस का सबसे बड़ा नेता बना दिया था और अब वह इस स्थिति में थे कि अंग्रेजों के विरुद्ध असहयोग, अहिंसा तथा शांतिपूर्ण प्रतिकार जैसे अस्त्रों का प्रयोग कर सकें। गांधी जी ने स्वदेशी नीति का आह्वान किया जिसमें विदेशी वस्तुओं विशेषकर अंग्रेजी वस्तुओं का बहिष्कार करना था। उनका कहना था कि सभी भारतीय अंग्रेजों द्वारा बनाए वस्त्रों की अपेक्षा हमारे अपने लोगों द्वारा हाथ से बनाई गई खादी पहनें। उन्होंने पुरूषों और महिलाओं को प्रतिदिन सूत कातने के लिए कहा। इसके अलावा महात्मा गाँधी ने ब्रिटेन की शैक्षिक संस्थाओं और अदालतों का बहिष्कार, सरकारी नौकरियों को छोड़ने तथा अंग्रेजी सरकार से मिले तमगों और सम्मान को वापस लौटाने का भी अनुरोध किया।

“स्वराज और नमक सत्याग्रह”

असहयोग आन्दोलन के दौरान गिरफ़्तारी के बाद गांधी जी रिहा हुए और वह स्वराज पार्टी और कांग्रेस के बीच मनमुटाव को कम करने में लगे रहे और इसके अतिरिक्त अस्पृश्यता, अज्ञानता, शराब, और गरीबी के खिलाफ भी लड़ते रहे।

इसी समय अंग्रेजी सरकार ने सर जॉन साइमन के नेतृत्व में भारत के लिए एक नया संवेधानिक सुधार आयोग बनाया पर उसका एक भी सदस्य भारतीय नहीं था जिसके कारण भारतीय राजनैतिक दलों ने इसका बहिष्कार किया। इसके पश्चात कलकत्ता अधिवेशन में गांधी जी ने अंग्रेजी हुकुमत को भारतीय साम्राज्य को सत्ता प्रदान करने के लिए कहा और ऐसा न करने पर देश की आजादी के लिए असहयोग आंदोलन का सामना करने के लिए तैयार रहने के लिए भी कहा। अंग्रेजों द्वारा कोई जवाब नहीं मिलने पर लाहौर में भारत का झंडा फहराया गया और कांग्रेस ने 26 जनवरी 1930 का दिन भारतीय स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया। इसके पश्चात गांधी जी ने सरकार द्वारा नमक पर कर लगाए जाने के विरोध में नमक सत्याग्रह चलाया जिसके अंतर्गत उन्होंने 12 मार्च से 6 अप्रेल तक अहमदाबाद से दांडी, गुजरात, तक लगभग 400 किलोमीटर की यात्रा की। इस यात्रा का उद्देश्य स्वयं नमक उत्पन्न करना था।  

इसके बाद लार्ड इरविन के प्रतिनिधित्व वाली सरकार ने गांधी जी के साथ विचार-विमर्श करने का निर्णय लिया जिसके फलस्वरूप गांधी-इरविन संधि पर मार्च 1931 में हस्ताक्षर हुए।1934 में गांधी ने कांग्रेस की सदस्यता से इस्तीफ़ा दे दिया। उन्होंने ग्रामीण भारत को शिक्षित करने, छुआछूत के ख़िलाफ़ आन्दोलन जारी रखने, कताई, बुनाई और अन्य कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देने और लोगों की आवश्यकताओं के अनुकूल शिक्षा प्रणाली बनाने का काम शुरू किया।

‘भारत छोड़ो आन्दोलन’

 ‘भारत छोड़ो’ स्वतंत्रता आन्दोलन के संघर्ष का सर्वाधिक शक्तिशाली आंदोलन बन गया जिसमें व्यापक हिंसा और गिरफ्तारी हुई। इस संघर्ष में हजारों की संख्‍या में स्वतंत्रता सेनानी या तो मारे गए या घायल हो गए और हजारों गिरफ्तार भी कर लिए गए। गांधी जी ने यह स्पष्ट कर दिया था कि वह ब्रिटिश युद्ध प्रयासों को समर्थन तब तक नहीं देंगे जब तक भारत को तत्‍काल आजादी न दे दी जाए। उन्होंने यह भी कह दिया था कि व्यक्तिगत हिंसा के बावजूद यह आन्दोलन बन्द नहीं होगा। गाँधी जी ने सभी कांग्रेसियों और भारतीयों को अहिंसा के साथ करो या मरो (डू ऑर डाय) के साथ अनुशासन बनाए रखने को कहा।

“विभाजन और आजादी”

 द्वितीय विश्व युद्ध के समाप्त होते-होते ब्रिटिश सरकार ने देश को आज़ाद करने का संकेत दे दिया था। भारत की आजादी के आन्दोलन के साथ-साथ, जिन्ना के नेतृत्व में एक ‘अलग मुसलमान बाहुल्य देश’ (पाकिस्तान) की भी मांग तीव्र हो गयी थी और 40 के दशक में इन ताकतों ने एक अलग राष्ट्र  ‘पाकिस्तान’ की मांग को वास्तविकता में बदल दिया था। गाँधी जी देश का बंटवारा नहीं चाहते थे क्योंकि यह उनके धार्मिक एकता के सिद्धांत से बिलकुल अलग था पर ऐसा हो न पाया और अंग्रेजों ने देश को दो टुकड़ों – भारत और पाकिस्तान – में विभाजित कर दिया।

“गाँधी जी की हत्या”

30 जनवरी 1948 को राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की दिल्ली के ‘बिरला हाउस’ में शाम हत्या कर दी गयी। गाँधी जी एक प्रार्थना सभा को संबोधित करने जा रहे थे जब उनके हत्यारे नाथूराम गोडसे ने उबके सीने में 3 गोलियां दाग दी। ऐसे माना जाता है की ‘हे राम’ उनके मुख से निकले अंतिम शब्द थे। दरअसल, वो राम का नाम लेते हुए मरना चाहते थे, लेकिन उस वक्त कुछ भी बोलने की संभावना नहीं थी.   

 


भीमराव आम्बेडकर

  बाबा साहेब अंबेडकर का जन्म मध्य प्रदेश के मऊ में 14 अप्रैल 1891 को हुआ था| बाबासाहब आम्बेडकर   भारतीय बहुज्ञ, विधिवेत्ता, अर्थशास्त्री, रा...