भारत में दिन प्रतिदिन कोरोनावायरस से संक्रमित केसों की संख्या बढ़ती जा रही है ऐसे में बात यह सामने आ रही है कि आखिरकार ऐसा हो क्यों रहा है? देशभर में पूरे लॉक डाउन के बावजूद लगातार मरीजों की संख्या बढ़ना देश के लिए बहुत ज्यादा दुख और चिंता की बात है ऐसे में यही बात सामने आती है कि यह सब सिर्फ सुपर स्प्रेडर्स के कारण हो रहा है. सुपर स्प्रेडर्स यह नाम शायद आपने पहली बार सुना होगा लेकिन एक यही कारण है जिसकी वजह से बड़ी तादाद में कोई महामारी कुछ ही पलों में सैकड़ों लोगों के बीच फैल जाती है.
सुपरस्प्रेडर्स कौन होते हैं?
सुपरस्प्रेडर्स कौन होते हैं?
सामान्य भाषा में यदि बात करें तो संक्रमण फैलाने वाला वह व्यक्ति जिसे कोई संक्रमण लग गया हो और यदि उसके परिवार में 3 सदस्य रहते हो तो उन तीनों को भी वह संक्रमण अपने कब्जे में ले लेता है. ऐसे में उस व्यक्ति को एक नॉर्मल स्प्रेडर कहा जाएगा. एक स्प्रेडर को वैज्ञानिक भाषा में जिसे R0- Rनॉट से संबोधित किया जाता है. यदि एक संक्रमित व्यक्ति ने तीन व्यक्तियों को संक्रमण दिया तो उसका संबोधन R3 से किया जाएगा. यदि एक संक्रमित व्यक्ति दो या तीन व्यक्तियों को ही संक्रमित करता है तो उसे एक नॉर्मल स्प्रेडर कहा जाता है. परंतु जब एक संक्रमित व्यक्ति कई हजार और सैकड़ों व्यक्तियों को संक्रमित कर सकते हैं तो उन्हें उसी प्रकार से संज्ञा दी जाती है- जैसे R100 या R1000. ऐसे बहुत सारे केस कोरोनावायरस जैसी महामारी के दौरान देखे जा चुके हैं जिनका वर्णन हम हमारी इस पोस्ट के जरिए करने वाले हैं. आर नॉट के आंकड़े में कमी लाने के लिए ही सोशल डिस्टेंसिंग का फार्मूला अपनाया गया है ताकि एक संक्रमित व्यक्ति दूसरे स्वस्थ व्यक्ति को संक्रमित ना कर सके.
सुपर स्प्रेडर्स की पहचान करना क्यों आवश्यक है?
अक्सर ऐसा होता है जब कोई बीमारी फैलना आरंभ होती है तब एक या दो व्यक्ति उस से ग्रसित होते हैं परंतु धीरे-धीरे जब 10 से पंद्रह और पंद्रह से सैकड़ों उसके बाद जब गिनती हजारों तक पहुंच जाती है तब ऐसी स्थिति में एक कॉमन स्प्रेडर्स की पहचान करना बेहद जरूरी होता है. जिस व्यक्ति को अपनी बीमारी के बारे में पता नहीं चलता है ऐसे में वह आम दिनचर्या के अनुसार काम करते हुए सैकड़ों लोगों को ग्रसित करता जाता है इससे पहले इस संक्रमण के प्रभाव को बढ़ने से रोका जा सकता है यदि हम सुपर स्प्रेडर्स की पहचान पहले से ही कर ले तो इस संक्रमण को फैलने से रोका जा सकता है.
अब सवाल यह आता है कि सुपर स्प्रेडर्स आखिरकार इतने ज्यादा संक्रमण कैसे फैला सकते हैं? क्या इनमे कोई जादुई शक्ति है?
· कारण यह है कि कुछ लोग जब संक्रमित हो जाते हैं तो आरंभिक दौर में उन्हें अपने संक्रमण होने का पता ही नहीं चल पाता है जिसकी वजह से वे अपनी आम दिनचर्या के अनुसार लोगों के बीच घूमते फिरते हैं और काम करते रहते हैं जिसकी वजह से वे अपना संक्रमण दूसरे कमजोर लोगों को दे देते हैं.
· दूसरा सबसे बड़ा कारण यह होता है कि कुछ लोगों की इम्युनिटी पावर बहुत अच्छी होती है वे संक्रमित होने के बाद भी जल्दी से बीमार नहीं पड़ते हैं जिसकी वजह से उन्हें पता नहीं चल पाता है कि वह संक्रमण से ग्रसित हो चुके हैं. हालांकि उनका संक्रमण कम इम्यूनिटी पावर वाले लोगों के अंदर बहुत जल्दी चला जाता है जिसकी वजह से वह व्यक्ति दूसरे स्वस्थ व्यक्तियों को शीघ्रता से अपना संक्रमण बिना पता लगे ही पहुंचा देता है.
· एक कारण यह भी होता है कि कुछ लोग बहुत ज्यादा भीड़ भाड़ वाली जगह पर रहते हैं ऐसे में उन पर वायरस का अटैक बहुत बड़ी मात्रा में होता है. मतलब एक साथ उन पर बहुत ज्यादा वायरस का टाइप हो जाता है जिसकी वजह से वे तो बीमार नहीं पड़ते हैं लेकिन उनका वायरस दूसरे इंसानों में बहुत शीघ्रता से चला जाता है. ऐसी स्थिति में उनकी लाल और साथ ही में उनका मूत्र विसर्जन भी किसी स्वस्थ व्यक्ति के लिए हानिकारक साबित होता है.

ऐतिहासिक केस :- सबसे पुराना और बड़ा केस टाइफाइड मैरी का था जो सन 1859 से लेकर 1938 तक चला था. यूनाइटेड स्टेट में रहने वाली हरी नाम की महिला एक कुक का काम किया करती थी और जिस घर में भी वह खाना बनाने जाया करती थी उस घर का व्यक्ति बीमार पड़ जाता था. ऐसे में वह बहुत सारे घरों के साथ जुड़ी हुई थी लेकिन टाइफाइड होने की वजह से वह कभी भी बीमार नहीं पड़ी और ना ही उसे किसी भी प्रकार का लक्षण टाइफाइड होने का महसूस हुआ. ऐसे में वह अपने समय के हिसाब से काम करती रही और लोगों में टाइफाइड की बीमारी फैलाती रही. जब विशेषज्ञों ने जांच की तब सबके बीच की एक कॉमन कड़ी मैरी को पाया गया जिसकी जांच करने के बाद उसे तुरंत आइसोलेट कर दिया गया.


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