चक्रवर्ती
राजगोपालाचारी भारत के वकील, लेखक,
राजनीतिज्ञ और दार्शनिक थे।
वे राजाजी नाम से भी जाने
जाते हैं। वे स्वतन्त्र भारत के द्वितीय
गवर्नर जनरल और प्रथम भारतीय गवर्नर जनरल थे। चक्रवर्ती राजगोपालाचारी का जन्म मद्रास
प्रेसीडेंसी में थोरापल्ली गाँव के एक समर्पित अयंगर परिवार में, माता-पिता चक्रवर्ती
वेंकटार्य अयंगर के घर 10 दिसंबर 1878 को हुआ था। इनके पिता का नाम नलिन चक्रवर्ती
था जो कि सेलम के न्यायलय के न्यायाधीश के पद पर कार्यरत थे। इनकी माता का नाम सिंगारम्मा
था।
राजगोपालाचारी ने मद्रास (चेन्नई) के प्रेसीडेंसी कॉलेज में लॉ में अपनी उच्च पढ़ाई जारी रखी। उन्होंने 1897 में अपनी स्नातक की पढ़ाई पूरी की। इनका विवाह सन् 1897 में अलामेलु मंगम्मा से हुआ। इनके तीन पुत्र व 2 पुत्रियां, कुल 5 संताने हुईं। सन् 1916 में इनकी पत्नी की मृत्यु हो गयी। इन्हीं की पुत्री लक्ष्मी का विवाह महात्मा गाँधी के सबसे छोटे पुत्र देवदास से हुआ।
राजगोपालचारी
वाइसराय भवन में रहते हुए भी बहुत ही सादा
जीवन बिताते थे और अपने कपड़े खुद धोते और अपने जूतों पर भी खुद पोलिश करते थे | उनकी
प्रतिभाओं से प्रभावित होकर माउंटबेटन में राजगोपालचारी को उनके भारत छोडकर जाने के
बाद गर्वनर जनरल पद देने का प्रस्ताव रखा | माउंटबेटन की पहली पसंद तो वल्लभभाई पटेल
थे और दुसरी पसंद राजगोपालचारी थे | जब नेहरु जी और वल्लभभाई पटेल ने खुद गर्वनर जनरल
के पद के लिए मना कर दिया तब राजगोपालचारी गर्वनर जनरल नियुक्त हो गये |
सार्वजनिक
जीवन में उन्होंने कई अहम पदों पर कार्य किया | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एक नेता
होने के अलावा वह मद्रास प्रेसीडेंसी के प्रमुख ,पश्चिम बंगाल के राज्यपाल , भारत के
गृह मंत्री और मद्रास के मुख्यमंत्री भी रहे |
सन् 1900
में उन्होंने सलेम कोर्ट में कानूनी प्रैक्टिस शुरू की। राजनीति में प्रवेश करने पर,
वह सलेम नगरपालिका के सदस्य और बाद में राष्ट्रपति बने। सन् 1904 में देशसेवा की भावना
से वे कांग्रेस में सम्मिलित हुए।
सन् 1921
में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के महासचिव बने। उस समय चक्रवर्ती राजगोपालाचारी
ने जवाहरलाल नेहरू, वल्लभभाई पटेल, मौलाना आज़ाद, अनुग्रह नारायण सिन्हा, राजेंद्र
प्रसाद के साथ अंतरंग संबंध स्थापित किया। कुछ ही समय में वह पार्टी के शीर्ष नेताओं
में से एक बन गए।
सन् 1930 में जब गांधी जी ने दांडी मार्च किया तो इन्होंने भी नमक कानून तोड़ा था. राजनीति के साथ-साथ ही राजगोपालचारी ने भारतीय जात-पात के आडंबर पर भी गहरा चोट किया. कई मंदिरों में जहां दलित समुदाय का मंदिर में जाना वर्जित था,
सन् 1937
में काउंसिल के चुनावों में मद्रास प्रांत
में कांग्रेस की जीत हुई. इसके अगुआ राजाजी रहे. उन्हें मद्रास का मुख्यमंत्री बनाया
गया. सन् 1939 में उन्होंने पद से इस्तीफा दे दिया.
सन् 1942
के कांग्रेस के इलाहबाद अधिवेशन में इन्होंने
भारत के विभाजन को स्पष्ट सहमति दी। अपने इस मत के लिए इन्हे कांग्रेसी नेताओं और जनता
का बहुत विरोध सहना पड़ा हालाँकि इन्होंने इसकी जरा भी परवाह नहीं की।
सन् 1946
में चक्रवर्ती राजगोपालाचारी को राज्यपाल के सदस्य के रूप में चुना गया था। अंतरिम
सरकार में उन्होंने शिक्षा और कला मंत्री के रूप में कार्य किया। उन्होंने उद्योग और
आपूर्ति मंत्री और वित्त मंत्री का पद भी संभाला।
सन 1951 में
राजगोपालाचारी जी ने अंग्रेजी भाषा में महाभारत की एक संक्षिप्त रीलिंग लिखी. इसके
साथ ही साथ राजगोपालाचारी जी ने अंग्रेजी में रामायण और भगवत गीता भी लिखी. इसके अलावा
राजनीति से बाहर आने के बाद राजगोपालाचारी जी ने अपने साहित्यिक कार्यों में अपना पूरा
समय समर्पित किया.
1972 में
राजगोपालाचारी जी का स्वास्थ्य ख़राब होना शुरू हो गया था. 10 दिसंबर को राजगोपालाचारी
जी का 94 वां जन्मदिन मनाने के ठीक 1 सप्ताह बाद यानि 17 दिसंबर को उन्हें सरकारी अस्पताल
में भर्ती किया गया. वे यूरिया, डीहाइड्रेशन, और यूरिनरी इन्फेक्शन से पीढित थे. धीरे
– धीरे उनका स्वास्थ्य और ख़राब होता चला गया, और 25 दिसंबर 1972 को क्रिसमस डे के दिन
राजगोपालाचारी जी का देहांत हो गया


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