लार्ड
माउंटबेटन ने भारत
आने के बाद
अनुभव किया कि,
कांग्रेस संयुक्त भारत चाहती
है। मुस्लिम लीग
विभाजित भारत ( पाकिस्तान )चाहती
है, अतः दोनों
में समझौता असंभव
है।
जिन्ना
ने सारे देश
में गङबङ फैला
रखी थी। हजारों
लोग मर रहे
थे और स्थिति
बेकाबू होती जा
रही थी। इसलिए
माउंटबेटन ने देखा
कि, भारत को
विभाजित करने के
अतिरिक्त कोई अन्य
विकल्प नहीं है।लेकिन
महात्मा गांधी ने कहा
था, कि चाहे
सारे भारत को
आग लग जाये,
तो भी पाकिस्तान
नहीं बनेगा।
उन्होंने
तो यहाँ तक
कह दिया था,
कि पाकिस्तान मेरी
लाश पर बनेगा।
अतः महात्मा गांधी
को पाकिस्तान के
लिए सहमत करना
असंभव था।
इसलिए
माउंटबेटन ने पंडित
नेहरू तथा सरदार
पटेल को पाकिस्तान
की स्थापना के
लिए सहमत करने
का प्रयत्न किया।सदार
पटेल ने बेगुनाहों
के कत्लेआम से
पाकिस्तान की स्वीकृति
अच्छी समझी और
नेहरू ने शेष
भारत को संगठित
और शक्तिशाली बनाना
अच्छा समझा। माउंटबेटन
ने दोनों की
सहमति प्राप्त करने
के बाद 3 जून,
1947 को भारत विभाजन
की योजना प्रकाशित
कर दी, जिसे
माउंटबेटन योजना कहते हैं।
इस
योजना को कांग्रेस
ने अपनी 14 जून,
1947 की बैठक में
स्वीकार कर लिया।किन्तु
जिन्ना की दृष्टि
में जो पाकिस्तान
दिया गया था
वह लंगङा पाकिस्तान
था, क्योंकि वह
तो सारा बंगाल
व असम पूर्वी
पाकिस्तान में मिलाना
चाहता था। इसी
प्रकार सारा पंजाब,
उत्तर -पश्चिमी सीमा प्रांत,
सिंध और बलूचिस्तान
को पश्चिमी पाकिस्तान
में शामिल करना
चाहता था।
अतः
जिन्ना ने लंगङे
पाकिस्तान को स्वीकार
करने से इंकार
कर दिया, किन्तु
माउंटबेटन के दबाव
के कारण अन्ततः
उसे स्वीकार करना
पङा।तत्पश्चात् भारत के
विभाजन की तैयारी
आरंभ हो गयी।
पंजाब और बंगाल
में जिलों के
विभाजन तथा सीमा
निर्धारण का कार्य
एक आयोग को
सौंपा गया, जिसकी
अध्यक्षता रेडक्लिफ ने की।
भारत
स्वतंत्रता अधिनियम के अनुसार
भारत का बँटवारा
कर दिया गया
और 15 अगस्त, 1947 को
दोनों को स्वतंत्रता
दे दी गई।महात्मा
गाँधी विभाजन के
कट्टर विरोधी थे।
लेकिन कांग्रेस अधिवेशन
में माउंटबेटन योजना
का समर्थन करते
हुए महात्मा गांधी
ने कहा था
– मैं विभाजन का
आरंभ से ही
विरोधी रहा हूँ,
किन्तु अब परिस्थिति
ऐसी उत्पन्न हो
गई है, कि
दूसरा कोई रास्ता
नहीं है। अब
प्रश्न यह उठता
है कि किन
परिस्थितियों से प्रेरित
होकर कांग्रेस ने
भारत का विभाजन
स्वीकार किया ।
भारत
विभाजन के कारण-
साम्प्रदायिक दंगे-
मुस्लिम
लीग ने पाकिस्तान
प्राप्त करने के
लिए सीधी कार्यवाही
शुरू करके साम्प्रदायिक
दंगों का सूत्रपात
किया था। इन
दंगों में भीषण
हत्याकांड हुआ और
अपार संपत्ति का
विनाश हुआ। अंतरिम
सरकार उन दंगों
को रोकने में
असमर्थ थी, क्योंकि
मुस्लिम लीग की
प्रांतीय सरकारें भी उपद्रवकारियों
की सहायता कर
रही थी।
अंग्रेज शासको के षड्यंत्र-
अंग्रेज
प्रशासकों की सहानुभूति
मुसलमानों के साथ
थी। साम्प्रदायिकता का
बीजारोपण अंग्रेजों ने ही
किया था।मुसलमानों को
विधान मंडलों में
अलग स्थान देने
के लिए प्रोत्साहित
किया।अंतरिम सरकार में मुस्लिम
लीग के सदस्य
कांग्रेसी मंत्रियों के लिए
सिरदर्द बन गये।
अंत में पंडित
नेहरू तंग आकर
कहा कि, हम
सिरदर्द से छुटकारा
पाने के लिए
सिर कटवाने को
तैयार हो गया।सरदार
पटेल ने नवंबर,1947
में नागपुर में
भाषण देते हुए
कहा कि, जब
अंतरिम सरकार में आने
के बाद मुझे
यह पूर्ण अनुभव
हो गया कि
राजनैतिक विभाग के षड्यंत्रों
द्वारा भारत के
हितों को बङी
हानि पहुँच रही
है, तो मुझे
विश्वास हो गया
कि, जितनी जल्दी
हम अंग्रेजों से
छुटकारा पा लें
उतना ही अच्छा
है……..मैंने उस
समय महसूस किया,
कि भारत को
मजबूत और सुरक्षित
करने का तरीका
है कि शेष
भारत संगठित किया
जाय।
सरदार
पटेल ने कहा
कि, हम उस
समय ऐसी अवस्था
पर पहुँच गये
थे, कि यदि
हम देश का
बँटवारा न मानते
तो सब-कुछ
हमारे हाथ से
चला जाता।
अविलंब स्वतंत्रता के लिए-
कांग्रेस ने देश
का विभाजन अविलंब
स्वतंत्रता प्राप्त करने के
लिए भी स्वीकार
कर लिया। अंग्रेज
हमेशा मुस्लिम लीग
का पक्ष लेते
रहे। लार्ड वेवल
मुस्लिम लीग के
बिना संविधान सभा
बुलाने को तैयार
नहीं हुआ और
उसे अंतरिम सरकार
में शामिल करने
के लिए भारत
सचिव के निर्देशों
की भी अवहेलना
की।
कांग्रेस की त्रुटिपूर्ण नीति-
कांग्रेस सदैव मुस्लिम
लीग से समझौता
करने को उत्सुक
रहती थी, इससे
लीग का अनवाश्यक
महत्त्व बढ गया
और वह समझने
लगी, उसके बिना
भारत की संवैधानिक
समस्या हल नहीं
हो सकती।कांग्रेस ने
1916 में लखनऊ पेक्ट
में लीग की
बहुत सी बातें
मान ली।सी.आर.फार्मूले में पाकिस्तान
की माँग काफी
सीमा तक मान
ली गई। इस
फार्मूले के संबंध
में बातचीत करने
के लिए गांधीजी
जिन्ना के पीछे
भागते रहे। 14 जून,
1947 को कांग्रेस कमेटी की
बैठक में पंडित
नेहरू ने कहा,
कांग्रेस भारतीय संघ में
किसी भी इकाई
को बलपूर्वक रखने
के विरुद्ध रही
है।
सशक्त भारत की इच्छा-
कांग्रेस के नेता
मुस्लिम लीग की
अडंगा नीति और
तोङ-फोङ की
नीति से तंग
आ चुके थे।
इसलिए उन्होंने अनुभव
किया कि मुस्लिम
लीग की इस
नीति के कारण
भारत कभी सशक्त
राज्य नहीं बन
सकेगा।
जिन्ना की हठधर्मी-
जिन्ना की हठधर्मी
के कारण गोलमेज
सम्मेलन और वेवल
योजना असफल हो
गयी और साम्प्रदायिक
समस्या का कोई
हल नहीं निकल
सका।जिन्ना सदैव कांग्रेस
को हिन्दू संस्था
सिद्ध करने का
प्रयास करता रहा।
अतंरिम सरकार की असफलता-
अंतरिम सरकार में
लियाकत अली वित्त
मंत्री थे, जो
कांग्रेस मंत्रियों की योजना
में सदैव बाधा
उपस्थित करते रहे।
कांग्रेस मंत्रियों के विभागों
को आवश्यक धन
स्वीकृत न करके
उन्हें बदनाम करने का
प्रयास करते रहे।
सरकार का चलना
असंभव बना दिया।
माउंटबेटन का प्रभाव-
साम्प्रदायिक दंगों के कारण
स्थिति अनियंत्रित होती जा
रही थी। इसलिए
माउंटबेटन ने अनुभव
किया कि भारत
को विभाजित करने
के अतिरिक्त और
कोई चारा नहीं
है। अंग्रेजों ने
भारत छोङने की
तिथि जून, 1948 की
बजाय 15 अगस्त, 1947 घोषित कर
दी थी, अतः
कांग्रेस के सामने
केवल दो विकल्प
थे- गृहयुद्ध या
पाकिस्तान।